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शाम का वक्त हो और 'शराब' ना हो.. इंसान का वक्त इतना भी 'खराब' ना हो

मत पूछ उसके मैखाने का पता ऐ साकी,

उसके शहर का तो पानी भी नशा देता है.


कभी उलझ पड़े खुदा से कभी साक़ी से हंगामा,

ना नमाज अदा हो सकी ना शराब पी सके।



हर बार सोचता हूँ

छोड़ दूंगा मैं पीना अब से,

मगर तेरी आड़ आती है

और हम मयखाने को चल पड़ते हैं।


मिलावट है तेरे इश्क में

इत्र और शराब की,

कभी हम महक जाते हैं

कभी हम बहक जाते हैं


नतीजा बेवजह महफिल से उठवाने का क्या होगा,

न होंगे हम तो साकी तेरे मैखाने का क्या होगा।


तेरी आँखों के ये जो प्याले हैं,

मेरी अंधेरी रातों के उजाले हैं,

पीता हूँ जाम पर जाम तेरे नाम का,

हम तो शराबी बे-शराब वाले हैं.



आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में ‘फ़िराक़’

जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए


ग़ालिब छुटी शराब पर अब भी कभी कभी

पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में


ये ना पूछ मैं शराबी क्यूँ हुआ, बस यूँ समझ ले,

गमों के बोझ से, नशे की बोतल सस्ती लगी।


उन्हीं के हिस्से में आती है ये प्यास अक्सर,

जो दूसरों को पिलाकर शराब पीते हैं.




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